सार्थक साथ तुम्हारा !

दो पल का साथ तुम्हारा,
भर गया नवचेतना मुझमें,
क्या खोया, क्या पाया ?
इस आपाधापी में-
पुन: बेहतर बनाने में,
कर गया अग्रसर मुझे-
सार्थक साथ तुम्हारा ।
तुमने सच हीं कहा था !
मुमकिन नहीं साथ हमारा !
जानता हूँ-
मगर न जाने क्यों ?
जीवन के हर मोड़ पर,
रहता है इन्तजार तुम्हारा !
तुमने हीं तो कहा था-
कभी साथ न छोड़ोगे,
कुछ पल के साथी मेरे,
क्यों छोड़ दिया तन्हा मुझको ?
दुनिया के इस विराने में !
भुला नहीं पाता हूँ,
छोटी-छोटी बातें तुम्हारी-
क्रमश:…

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