वंश का अपमान हीं हमारा अपमान है

महाभारत से जुड़ी एक कथा है जो बहुत हीं प्रेरक भी है। धर्मराज युधिष्ठिर को सूचना मिली कि किसी शत्रु ने दुर्योधन को बन्दी बना लिया है समाचार पाकर वह बहुत हीं व्याकुल हो उठे। तत्काल उन्होंने महाबली भीम को दुर्योधन को छुड़ा लाने का आदेश दिया किंतु भीम इस बात से नाराज़ हो गया और बोला, “भैया, आप मुझे उस पापी को छुड़ाने की बात कह रहे है जिसके कारण आज हमारी यह दशा है। उस दुर्योधन ने न्याय-अन्याय, नीति-अनीति, मान-अपमान की कभी परवाह तक नहीं किया, अपनी भाभी का भरी सभा में वस्त्र हरण करना चाहा, उसके प्रति आपके दिल में इतना प्रेम आपको शोभा नहीं देता है।”
भीम के कड़वी बातें सुन कर युधिष्ठिर चुप हो गये। अर्जुन भी उस समय वहाँ उपस्थित था और वह समझ रहा था कि युधिष्ठिर दुर्योधन के बन्दी बनाए जाने के कारण बहुत व्याकुल और परेशान भी है। अर्जुन ने अपना गाण्डीव उठाया और वहाँ से चला गया। अर्जुन कुछ देर उपरान्त वापस आकर दुर्योधन की मुक्ति और शत्रु के वध की सूचना युधिष्ठिर को दिया।
सूचना पाकर धर्मराज युधिष्ठिर खुश हुए और बोले, ” महाबली भीम, मेरे भाई, हमारा आपस में भले हीं मतभेद हो, शत्रुता हो फिर भी संसार की नज़र में हम भाई-भाई हैं। हम कौरव और पांडव हैं किंतु हमारा वंश एक है हममें से किसी एक का भी अपमान होता है तो हमारे पूरे वंश का अपमान होता है हम सभी का अपमान होता है।” भीम सहित सभी भाईयों ने युधिष्ठिर की बातों से सहमत हुए।

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