मेरे हमनशी

हो के इतने करीब, ऐ मेरे हमनशी !
अब युदाई न मुझसे सही जाएगी;
हो जो अब दूरियाँ, खुल के इतना बता,
मौत कब मेरे पहलू में मुस्काएगी !?

तेरी महफिल ने मुझको है रुसवा किया,
जाम-ए-उल्फत के बदले जहर दे दिया;
मरके भी बददुआएँ न दूँगा कभी,
चाहता ही रहूँगा तुझे उम्र भर !
दर्द-ए-दिल का जो एहसास होगा कभी,
मेरी बाहोँ मेँ तू खुद सिमट आएगी !!
हो के इतने करीब…

हो गई क्या खता जो किनारा लिया,
लाके साहिल पे कश्ती डुबा क्यों दिया !?
लुट गया मैं, खबर यह भी तुझको नहीं,
बन के क्या रह सकोगी मेरे हमसफर !
सांस थम जो गई ऐसे हालात में,
जिन्दगी रो-रो गुजरेगी, पछताएगी !!
हो के इतने करीब…

घड़ियांँ ऐसी भी हमने गुजारी कभी,
अपनी दीवानगी पर हमें नाज था;
हो गया क्या जो नजरें तेरी फिर गई,
धूल मेँ मिला गया वो जो सरताज था !
टूट जाएगी जो तुमसे रश्म-ए-जहाँ,
चैन की जिन्दगानी न कट पाएगी !!
हो के इतने करीब, ऐ मेरे हमनशी !

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