मेरी प्यारी…

मेरी प्यारी…
हर रात सोचता हूँ
तुम्हें कुछ लिखूँ
सामने कागज, और-
हाथ में कलम होता है
लिखता हूँ-
मेरी प्यारी…
आगे लिख नहीं पाता
उहापोह में रात कटती है,
पुन: रात, फिर कोशिशें…
हाथ आता है नाकामी
कागज नोच फेंकता हूँ
नये कागज में पुन: लिखता हूँ
पुरा कर नहीं पाता,
बस इतना हीं लिख पाता हूँ
मेरी प्यारी…मेरी प्यारी…
सोचता हूँ तुम्हें भेजूँ
तुम्हें मिलेगा और खुब हँसोगी
कहोगी “पागल” ।

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