चेहरा देखा करो !

आईना हो जब भी आगे, चेहरा देखा करो !!

–झूठ से यह दूर रहता, सच के आगे कुछ न कहता;
यह सदा सच बोलता है, …क्या बुरे, अच्छों को भी यह तौलता है !
है भला इसमें कि इसके सामने होकर खडे, बस इसकी ‘हाँ में हाँ’ भरो !
आईना हो जब भी आगे, चेहरा देखा करो !!

–तिल-तिल गुजरता वक्त है, तिल-तिल गुजर जाती जवानी;
लोग ऐसे हैं बहुत कम, छोड़ जो जाते निशानी !
कल जो था देखा, हुआ चेहरा पुराना;
आज अपने इस नए से मुंह तो मत इस कदर फेरो !
आईना हो जब भी आगे, चेहरा देखा करो !!

–नियति इसकी मौन रहना, किसी से भी कुछ न कहना;
लोग चाहे जो समझ लें, अपनी मस्ती में ठहरना !
है यही पैगाम इसका– ‘गुजरे पल को याद करके मत कभी आहें भरो !!
आईना हो जब भी आगे, चेहरा देखा करो !!

-‘निषाद’
साहिबगंजबी;  ‘लक्ष्मी निकेतन’:हरिपुर,  [816109 -झारखण्ड]

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