कहाँ मिलेगा भदैया धान ?

दस दिनों तक अपना ख़ौफ़ दिखा कर बाढ़ का पानी उतर चुका है किंतु उसकी मौजूदगी अब भी बरकरार है, चूल्हा एक छोटे से कुएँ में तब्दील हो चुका है ! ज़मीन पर घास अब अपनी कमर सीधी करने की कोशिश में लगा है जैसे जाड़े के दिनों में रज़ाई के अंदर सोते हुए आदमी का कमर निकल आता है उसी तरह घास की पीली सी कमर धूप का एक टुकड़ा पाने के लिए कीचड़ से बाहर निकल चुका है ! दोपहर का समय है चिड़ियों, भेड़-बकरियों से लेकर हर कोई अपनी अस्त-व्यस्त हालत को व्यवस्थित करने में लगा है । संध्या ओसारे पर इंटो को जोड़ कर खाना बनाने की कोशिश में लगी है, चूल्हा को खाना बनाने लायक होने अभी दो चार दिन और लगेंगे । संध्या का पति आधा कीचड़ में सना ओसारे पर आकर धम्म से बैठता नहीं मानो गिरता है, हाथ से लाठी भी छूट कर लुढ्क जाती है ।
” क…का हुआ, कहीं कूच्छो काट वाट तो नहीं लिया… ”
संध्या दौड़ कर उसके पास आती है एक अनजाने डर से कहीं साँप तो नहीं काट लिया क्योंकि बाढ़ में अगर सबसे ज़्यादा डर होता है तो बस इन साँप-बिच्छुओं का हीं , बाढ़ का क्या है सालना तो दो-चार बार तो आ हीं जाता है जैसे हमारे रिस्तेदार विशेष मौकों पर मिलने आ जाया करते है ।
” अरे साँप का काटेगा, गेणियाँ नहीं देखा है हमरा…”
बहुत हीं अनमने किंतु थोड़ा अकड़ के साथ बोला जैसे गेणियाँ नहीं एके 47 राईफल हो । गेणियाँ बाँस की एक प्रजाति है जिसके अंदर सुराख नहीं होता और उसे लाठी बनाने का बहुत शौक भी था, एक लाठी बनाने में बहुत हीं मेहनत करता था । पहले तो इस बात का ध्यान रखना कि बाँस कहीं कच्चा तो नहीं, कहीं ज़्यादा पक तो नहीं गया फिर उसमें सरसों का तेल लगा कर रात-रात भर ओंश में भींगाना सुबह घास में आग लगाकर सेंककर सीधा करना और बहुत सारे तरीके अपनाता तब जाकर बनती थी उनकी लाठी, तभी तो हर साल दशहरा, वैशाखी में उसकी लाठी सर्वश्रेष्ट आता था !
” तो फिर का हो गया ऐसे काहे निढाल हो गये …” बोलते-बोलते संध्या पानी का लोटा थमाती है !
” सब ख़तम हो गया, सारा धान का विराडो पानी में गल गया, सारा रोपा ख़तम हो गया, सब ख़तम हो गया…”
” काहे, खेत का पानी गया नहीं का, सब बोल रहा था पानी ख़तम हो गया है, फिर…” संध्या बोली !
” पानी तो ख़तम हो गया लेकिन ठेठु भर पाकों (बाढ़ के साथ आया कीचड़ ) भर गया, कैसे बचेगा धान…सब खेत बराबर हो गया है…सब साग सब्जी…सब माटी हो गया…”
संध्या का पति एक पल के लिए रुकता और फिर गहरी सांस लेकर कर फिर बोलता है
“घर में और धान है का…कल खेत में छींट देते…और का कर सकते है…
“धान है थोड़ा…खाने के लिए रखे है…छींट देंगे तो खाएँगे का…अगहन में अभी चार महीना बांकी है…अभी पहला बाढ़ है औरो आना अभी बाँकिए है…! संध्या चिड्ते और रुआंसा होते हुए बोली !
” उ तो बाद में देखेंगे…एक काम और कर सकते है…नदी का उपार नेमा में भादैया छींट देते है…फिर बाढ़ आएगा तैयो कुच्चो न कुच्चो तो बचिए जाएगा…देर हो गया…भादो में नहीं तो आसीन के शुरू में कटिए जाएगा…” संध्या के पति ने समझाते हुए कहा !
” कहाँ मिलेगा भदैया धान…? के लगता है अब मोटका भदैया…? संध्या एक फिर झुंझला उठी !
” नदी का उपार अपने खेत के बगले में महवीरवा का खेत है…उ लगाया है…महवीरवा की माय से एक कट्ठा धान ले लो…बदला में भदैया त भदैया नही त अगहनीय दे देंगे…
” पूछेंगे..एक बात औरो आज मुखिया और कौन-कौन न आया था सबका नाम लिख रहा था…बोल रहा था सरकार पैइसा देगा…” संध्या बोली !
“अरे ई पैसा उसको मिलेगा जिसका घर बाढ़ में ढह गया है, जिसका खेत ढहा है उसको कुछ नहीं मिलने वाला है, वैसे भी ई सरकार का चक्कर छोड़ो…सरकार अपने आप को संभाले वही बहुत है…कहीं एलेक्सन-वलेक्सन का चक्कर पड़ गया…वो हो खर्चा हमीं लोगों को ढोना पड़ेगा…! संध्या का पति झुंझलाते हुए कहा और दूर कीचड़ में पड़ी अपनी गेणियाँ लाठी को एक टक देखे जा रहा था जिसे कभी लोग छुने को भी तरसते हैं… !

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2 thoughts on “कहाँ मिलेगा भदैया धान ?

  1. * संयोगवश आप प्रख्यात आंचलिक कथाकार ‘फणि बाबू’ के क्षेत्र से हैं। अतः आप में अपनी भूमि के प्रति आकर्षण का समावेश अत्यन्त स्वाभाविक है इसे अपने साथ-साथ लिए चलिए। हम किसी राजाश्रय में पलने वाले वैसे इतिहासकार नहीं, जिन्हें प्रभुवर्ग की गुणगान के अतिरिक्त कोई अन्य बस्तुएं नहीं दिखती, हम तो जन-जन के प्रतिनिधि हैं। –N. S. , (Sahibganj).

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