आदर्श और नैतिकता

महर्षि चरक आयुर्वेदिक औषधियों के लिए विख्यात है उन्होंने आयुर्वेदिक औषधियों पर चरकसंहिता नामक ग्रंथ भी लिखा है। वे हमेशा औषधियों की तलाश में वनों में भटका करते थे । एक बार वह अपने कुध शिष्यों के साथ औषिधयों की खोज में कहीं जा रहे थे क़ि अचानक उन्हें एक विशेष प्रकार का फूल दिखाई दिया और उसे तोड़ने के लिये हाथ बडाया हीं था कि कुछ सोच कर रुक गये।
“गुरुदेव, आप रुक क्यों गये, इस फूल को तोड़ने में कोई समस्या तो नहीं होनी चाहिए ?” महर्षि ने कहा, ” नहीं, इसमें कोई समस्या तो नहीं है किंतु हमें कोई भी वस्तु उसके मलिक की आज्ञा के बिना नहीं लेना चाहिए यह उचित नहीं है।” एक शिष्य ने पूछा।
शिष्य ने पुन: कहा, “किंतु गुरुदेव, हमें तो राजाज्ञा प्राप्त है कि हम राज्य के किसी भी क्षेत्र से कोई भी वनस्पति औषधि के लिए ले सकते है।” शिष्य ने उत्सुकता जाहिर करते हुए कहा।
“हाँ, तुम ठीक कह रहे हो मगर राजाज्ञा के आधार पर वस्तु के मालिक का उपेक्षा करना यह तो नैतिकता नहीं है और फिर हमारा आदर्श कहाँ रहा, तुम्हारी अनुमति के बिना अगर कोई तुम्हारा कोई वस्तु ले क्या तुम्हें अच्छा लगेगा फिर चाहे उसका उपयोग भलाई के काम में हीं क्यों न हो।” महर्षि चरक ने अपने शिष्य को समझाते हुए कहा और मीलों दूर चल कर उस खेत के मालिक से आज्ञा ले कर हीं फूल तोड़ा।

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