आज की कविता

युग-युग में,
हमने अपने कौशल से
कला को पुनर्जिवित कर,
मूर्छित संवेदनाओं को झकझोरने की चेष्टा की;
और कविता स्वयं एक माध्यम बन बैठी,
…मानव-जीवन का सर्वश्रेष्ठ अवदान का रूप लिए !!
यह सच है—
ध्वनियों के लेख्यगत स्वरूप के पूर्व,
तीक्ष्ण- मूक संवेदनशीलता ही हमारी पथ-प्रदर्शिका थी;
न थी जरुरत,
हथौडे़ की चोट से कसमसाए मनोभावों को प्रस्तर-खण्डों पर उभारने की,
न ही तूली-रंगों द्वारा आहों को उतारने की।
युग-क्रम में हीं,

किसी विरही की अंतर्वेदना कंठ फोड़ कर बाहर निकल आई;
लिखित संक्षेपण तो इसके बहुत बाद आया।
कविता एक आह भी है और एकालाप भी !
एकांत मंगल-मुहूर्ति सदैव चिंतन का नवनीत लुटाया है,
और निराश भी नहीं,
क्योंकि माना है —
‘सृष्टि नैराश्य का फल नहीं; साथ, स्रष्टा कभी निराशावादी नहीं हो सकते !! …..’

-‘निषाद’   साहिबगंजबी; ‘लक्ष्मी-निकेतन’ हरिपुर -816109, (झारखण्ड)

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